नवलय मोनो

किसी संस्था अथवा संगठन का मोनो या पहचान चिन्ह बनाना मूलतः एक व्यापारिक कल्पना है। परंतु संस्था के विचारों और उसकी प्रकृति को बहुत छोटे में व्यक्त करने के लिये मोनो एक सषक्त माध्यम होता है। कालांतर में यही चिन्ह संस्था की पहचान बनता है। जब नवलय की स्थापना हुयी तब नवलय के लिये भाी ऐसे ही मोनो की तलाष प्रारंभ हुयी जो नवलय का नाम, उसकें काम और उसके वैचारिक धरातल को पूर्णतः अभिव्यक्त कर सके।
नवलय के ९ संस्थापक सदस्य थे और सभी समाज जीवन के किसी न किसी कार्य से सक्रियता से जुड़े हुऐ थे। ये सभी नवलय की स्थापना हेतु एकत्रित हुऐ। नवलय के मोनो में लगे ९ वलय भी इसी भाव का व्यक्त करते है। सभी वलय पृथक केन्द्र, पृथक आकार और अपने नजदीकी वलय से पृथक रंग लिये हुऐ है पर पृथक होकर भी सभी वलय समकेद्रीत न होकर धरती पर एक जगह आकर टिके हुए है, और मिलकर एक वलय अर्थात ‘नवलय’ बनाते है उनका धरती पर टिका होना धरती से जुड़े रचनात्मक कार्यो को करने की नवलय की प्रतिबद्धता प्रदर्षित करता है। इन वलयों को देखने पर ऐसा आभास होता है मानो कोई तरंग अभी केन्द्र से उठी है और बड़ी होती – होती जा रही है। समाज में ऐसी लय लगातार उठती रहे यही तो है -‘नवलय’।
अनुशासन में खड़े सभी नौ वलय नवलय बनाने के लिये एक छत के नीचे इकट्ठे हुए है। यह छत है नवलय का बाध वाक्य जो सभी वलयो का अपने में समाहित किये हुए है। नवलय से निकलने वाली हर नव लय उसी बोध वाक्य रुपी आसमान का छूना चाहती है। हर लय की यही दिषा है – हर गीत का यही ध्रवपद है -:
”भला हो जिसमें देश का वह काम सब किये चलो”