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नवलय – कुछ नया करने की चाह

नवलय का अनऔपचारिक गठन अगस्त-सितम्बर, 1999 के दौरान ही हो गया था परंतु उस समय इसका स्वरूप एक ही दिशा में कार्य कर रहे उत्साही युवकों की एक टोली के रूप में था । अपने विचारों एवं ऊर्जा को एक निश्चित मार्ग पर अग्रसर करने हेतु इस टोली का औपचारिक गठन कर इसका बाह्य स्वरूप तय करने की दृष्टि से इसे एक पंजीकृत स्वयंसेवी संस्था के रूप में विकसित करना तय हुआ । तद्नुसार 15 मार्च, 2000 को यह टोली नवलय के नाम से पंजीकृत हुई । नवलय के अधिकृत उद्देष्यों में यद्यपि कई प्रकार के उद्देष्य शामिल हैं पर इसे यदि एक वाक्य में समझना हो तो नवलय के मोनो एवं इसके बोध वाक्य को देखना पर्याप्त है। नवलय का मोनो एक धुरी में उठती तरंगों का है जो कि निरन्तर बड़ी होती जाती हैं और इस मोनो पर जो ध्येय वाक्य लिखा है वह है, भला हो जिसमें देष का वह काम सब किये चलो  इस तरह वे सभी कार्य जिससे देष का कुछ भी भला होता है वे नवलय के उद्देष्यों में शामिल हैं और नवलय के प्रत्येक कार्य या कार्यक्रम में किसी ना किसी प्रकार देषवासियों के प्रति परोपकार की भावना जुड़ी होती है